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| Wednesday 20 August, 2008 |
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ये किसकी तलाश......?
मे ये किसकी तलाश मे निकल पड़ा की जिसका मुझे पता ही ना था.
रास्ते बहुत थे मगर कोई हमसफ़र ही ना था,
देखा जो कहीं दूर एक इंसान खड़ा था
चहेरे पर परेशानी आँखों मे तूफान बड़ा था,
होंटो मे प्यास और दिल मे एक टूटा अरमान पड़ा था.
वो कुच्छ कहना चाहता था,पर उसके मुँह मे साहस ही ना था.
मे ये किसकी तलाश मे.......
बाद उसके मुझे सच मिला,चेरहे पर काला टीका कुर्ते पर लाल दाग लगा था.
आँखे झुकी काँपते होंठ लगता है अभी अपमान हुआ था,
क्योकि पहले झूठ इतना ताकतवर ना था,वरना सच कभी हरा ना था.
मे ये किसकी तलाश मे......
फिर धर्म आया उसने इंसान और सच को सनझाया था.
अब हमारी कोई कीमत नही,यहाँ झूठ ने सच को हराया है,
इंसान को कठपुतली और धर्म को जीतने का ज़रिया बनाया है,
अब इंसान बिकता है बाज़ार मे , सच हज़ार मे और धर्म बदल गया अत्याचार मे फिर वो ले गया उनको बहुत दूर था.
मे ये किसकी तलाश मे निकल पड़ा,की जिसका मुझे पता ही ना था.
रास्ते बहुत थे मगर कोई हमसफ़र ही ना था, .............मनोज खन्ना
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