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manoj khanna
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 13:56 | 9/Jul/2008 | 1 Comment(s)

There was a little kid called "HOPE" having  kept smile on face.

Whenever I looked at, it made me smile too.

I always got the warmth of it's rays in my life to overcome those moments which had tried to pull me, my will and dream down.

One day when burry had come to me and begun to make me scare and it had put me alone in the crowd.

Then that little kid came to me & hold my hands and said with shining smile that I am with you. Although I am too little but if you trust me and can see me even in darkness.

I will carry you on the crest because every successfull  and happy person had seen me.

You can ask them you feel they are successfull & happy.

SO "HOPE" IS LIFE

 

 

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 11:34 | 21/Mar/2008 | 3 Comment(s)
तीरों की बारीष ख़त्म करो यारो.......

बहुत लग चुके है ,पैबंद दामन पे अपने 
अब तो तीरों की  बारीष ख़त्म करो यारों, 
दो घड़ी पास बैठो मोहब्बत की बात करो यारो. 


जिनके  कहने पर हमने खून वहाया 
तूने मेरा और मैने तेरा घर जलाया, 
खादीं मे छुपे उन शैतानों को पहचनो यारों
दो घड़ी पास बैठो मोहब्बत की बात करो यारो. 


मेरे घर मे नन्हे बच्चे है,तो तेरे घर मे भी है बुडी माँ 
ज़िम्मेदारी मुझ पर भी है ज़िम्मेदारी तुझ पर भी 
 तो क्यो ना अपनो की बात करे यारों  


दो घड़ी पास बैठो मोहब्बत की बात करो यारो. 


ना मेरा ईश्वर तुझसे खफा है, ना तेरा अल्लाह मुझसे जुदा
दिल से पुकारो दोनो मिलेंगें यहाँ,
तो चलो शिर्डी मे सर झुकाएँ और दरगाह मे दुआ माँग आएँ यारो
दो घड़ी पास बैठो मोहब्बत की बात करो यारो.


बहुत लग चुके है ,पैबंद दामन पे अपने 
अब तो तीरों की  बारीष ख़त्म करो यारों, 
दो घड़ी पास बैठो मोहब्बत की बात करो यारो. 


..........मनोज खन्ना


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 13:34 | 25/Feb/2008 | 8 Comment(s)
ये किसकी तलाश......?

मे ये किसकी तलाश मे निकल पड़ा की जिसका मुझे पता ही ना था.

रास्ते बहुत थे मगर कोई हमसफ़र ही ना था,

देखा जो कहीं दूर एक इंसान खड़ा था

चहेरे पर परेशानी आँखों मे तूफान बड़ा था,

होंटो मे प्यास और दिल मे एक टूटा अरमान पड़ा था.

वो कुच्छ कहना चाहता था,पर उसके मुँह मे साहस ही ना था.

मे ये किसकी तलाश मे.......

बाद उसके मुझे सच मिला,चेरहे पर काला टीका कुर्ते पर लाल दाग लगा था.

आँखे झुकी काँपते होंठ लगता है अभी अपमान हुआ था,

क्योकि पहले झूठ इतना ताकतवर ना था,वरना सच कभी हरा ना था.

मे ये किसकी तलाश मे......

फिर धर्म आया उसने इंसान और सच को सनझाया था.

अब हमारी कोई कीमत नही,यहाँ झूठ ने सच को हराया है,

इंसान को कठपुतली और धर्म को जीतने का ज़रिया बनाया है,

अब इंसान बिकता है बाज़ार मे , सच हज़ार मे और धर्म बदल गया अत्याचार मे फिर वो ले गया उनको बहुत दूर था.

मे ये किसकी तलाश मे निकल पड़ा,की जिसका मुझे पता ही ना था.

रास्ते बहुत थे मगर कोई हमसफ़र ही ना था, .............मनोज खन्ना

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 18:35 | 19/Feb/2008 | 2 Comment(s)
ऍहसास ही जिंदगी है...

अगर हम कहे की जिंदगी एहसास है या कहे की एहसास ही जिंदगी है. तो ग़लत नही होगा क्योकि जिंदगी के हर पल मे कोई न कोई एहसास शामिल है जैसे खाने से पहले भूख का एहसास ज़रूरी है, सोने से पहले नींद का एहसास ज़रूरी है,काम कम करने से पहले काम करने कीं इच्छा का एहसास ज़रूरी है,और किसी से बात करने से पहले बात करने की इच्छा का एहसास ज़रूरी है यहाँ तक की अगर हम किसी को अपना दोस्त भी बनाते है तो हमारे अंदर उसके प्रति दोस्ती का एहसास होना बहुत ज़रूरी है.देखा जाए तो ये एहसास ही है जो एक इंसान को दूसरे इंसान से अलग पहचान देते है.अगर एहसास सकारात्मक है तो लिंकन और गाँधी को जन्म देते है लेकिन नकारात्मक रूप धारण कर दाऊद और लादेन भी समाज को दे देते है.हम चाहे तो इस दुनिया मे ही एहससो के द्वारा स्वर्ग और नर्क को भी समझ सकते है .जब हम किसी से प्यार है,किसी की सच्चे दिल से मदद करते है याकिसी को सम्मान देते है तो जो एहसास हमे होते है वो किसी स्वर्ग से कम नही है,वही जब हम किसी को सताते है किसी को कोई तकलीफ़ देते है या कोई पाप करते है,किसी की बद्दुआ लेते है और किसी ग़लत काम की वजह से शर्म महसूस करते है तो समझ लीजिए नर्क इससे भी भयंकर होगा.हर इंसान की जिंदगी मे ये एहसास अलग अलग स्थान रखते है और परिणाम भी वैसा ही लाते है.हर परीक्षा किसी को सफलता और किसी को असफलता का एहसासा होता है अगर सामाजिक और राजनीतिक स्थिति को सामने रखकर देखें तो पाएँगे की आज समाज के हालत बददतर या बेहतर होना भी बहुत हद तक एहसास पर ही निर्भर करते है.क्योकि एक ग़लत व्यक्ति की पक्ष मे लालच या बहकावे के एहसास मे मतदान करने का एहसास होना, हमारे और समाज के हालत बददतर बना देता है,
और एक सही व्यक्ति के पक्ष मे समझदरीपूर्ण मतदान का एहसास हमारे और समाज के हालत बेहतर सकता है.अगर हम तोड़ा सा भी इतिहास मे ध्यान दे तो पाएँगे हर काल मे घाटी बड़ी और महत्वपूर्ण घटना के पीछे सिर्फ़ एहसास ही है.तो ये सच ही है अगर एहसास नही होते तो शायद रामायण महाभारत और बाइबिल जैसे ग्रंथो की कल्पना करना भी मुश्किल था.ये एहसास ही जिन्होने एक डाकूको संत बनाकर रामायण जैसा ग्रंथ लिखवाया.और इसी एहसास ने शकुनी पैदा कर महाभारत रचवाया और इसी ने भगवान इशू के द्वारा दुनिया को मानवता का पाठ पढ़या दुनिया आज बदली नज़र आती है तो एहसासो के कारण ही अगर आवश्यकता और इच्छा का एहसास ना होता तो आज जिस कंप्यूटर पर हम काम कर रहे है या जिस मोबाइल से बात कर रहे ये भी संभव नही होता और दुनिया को जानना तो दूर हम अपने गाँव शहर और देश के बारे मे भी नही जान पाते ,हमे नही पता होता हवाई जहाज़ क्या होता है ,कंप्यूटर किसे कहते है और मंगल नाम का कोई ग्रह भी है.इसलिए हमे अपने अंदर के एहसास को जगाना होगा सारी सुविधाओ के उपभोग के साथ समझना होगा बूढ़े मा बाप के दुख के एहसास को.अनाथ बच्चो की भूख के एहसास को और जवान बेटी के ग़रीब बाप के एहसास को , समझना होगा किसी की मदद के एहसास को किसी को खुशी के दो पल देने के एहसास को और सबसे बड़कर इंसानियत के एहसास को क्योकि ये ही वो एहसास है जो दे सकता है,हम सब को खुशहाल जिंदगी.
----मनोज खन्ना

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 15:12 | 18/Feb/2008 | 3 Comment(s)
मेहनत तो बैल भी करता है....


मे जब सोचता हूँ,खुद के बारे मे तो उदास हो उठता हूँ.
एक अजीब सा ख्याल मुझे डराने लगता है.जैसे मेरा बहुत कुछ खो गया है या शायद बहुत कुछ खोने जा रहा है, पर क्या ?
ये तो मे भी नही जनता पर हाँ शायद कुछ तो है जो बराबर एहसास करता है,की कुछ पाने की खुशी कैसी होगी. ये एहसास करता है की इस खुशी पर मेरा भी अधिकार है.पर खुशी क्या यूँ ही मिल जाती है ?बिल्कुल नही क्योकि हर अच्छी चीज़ कीमत मांगती है पूरी कीमत त्याग की ,मेहनत की ,लगन की तब कहीं इसके एक छोटे से अंश का सुख प्राप्त होता है. किंतु ये सुख एक उद्देश्य के, एक लक्ष्य के घर मे रहता है,और सुख तक पहुँचने से पहले इसका दरवाजा पार करना ज़रूरी है.
क्योकि मेहनत तो वो बैल भी करता है, जो गाड़ी को खींचता है तो क्या वो सुखी है ?नही ना क्योकि वो उद्देश्यहीन है. उद्देश्य के बिना हम अपनी मंज़िल नही पा सकते है.
इसलये उद्देश्य ज़रूरी है,और उद्देश्य की पूर्ति के लिए लगन क्योकि हम कोई भी काम शुरू तो जोश से करते है.किंतु फिर हम उद्देश्य से छूटने लगते है,जैसे तालाब मे पत्थर फेकने पर कुछ देर के लिए लहरे उठती तो है किंतु फिर सामान्य हो जाती है.----------मनोज खन्ना

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